Sunday, January 16, 2022

इस रेलवे स्टेशन को सरकार नहीं चलाती, गांव के फौजी हैं यहां के मालिक, घाटे में किया था बंद, मगर अब आया प्रॉफिट में

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नई दिल्ली। हम जानते हैं कि भारत का हर रेलवे स्टेशन भारतीय रेलवे के अधीन ही आता है। इन सभी रेलवे स्टेशनों का रख रखाव करना और इनसे मुनाफा कमाना जैसे सभी काम इंडियन रेलवे ही करता है। वहीं भारत में किस रेलवे स्टेशन को बंद करना है या किस रेलवे स्टेशन को शुरू करना है इस बात का फैसला भी भारतीय रेलवे द्वारा ही किया जाता है।

लोग चंदा जमा कर के चलाते हैं

लेकिन आपको बता दें कि भारत में एक ऐसा रेलवे स्टेशन है जिसे भारतीय रेलवे नहीं चलाता। इस रेलवे स्टेशन को फ़ौजियों के एक गाँव द्वारा भी चलाया जाता है। इस रेलवे स्टेशन को गाँव के लोग चंदा जमा कर के ही चलाते हैं। इतना ही नहीं खास बात तो ये भी है कि एक समय पर ये रेलवे स्टेशन घाटे में चला गया था जिसे गाँव वालों ने अपनी कड़ी मेहनत से वापस मुनाफे में लाया। आइए जानते हैं पूरी खराब विस्तार से।

जालसू नानक हॉल्ट रेलवे स्टेशन

आमतौर पर भारत के हर स्टेशन का रखरखाव भारतीय रेलवे द्वारा ही किया जाता है। रेलवे स्टेशन से जुड़े अहम फैसले भी भारतीय रेलवे ही करता है। लेकिन आपको बता दें कि हमारे भारत में ही एक ऐसा रेलवे स्टेशन मौजूद है जिसके करता धरता गाँव वाले ही हैं। इस स्टेशन को गाँव वालों के द्वारा ही चलाया जाता है। ये स्टेशन राजस्थान के नागौर ज़िले में मौजूद है जिसका नाम जालसू नानक हॉल्ट रेलवे स्टेशन है। इस रेलवे स्टेशन को गाँव के लोग ही चलाते हैं। स्टेशन को गाँव वाले चंदा जमा करके ही चलाते हैं। गाँव वाले पिछले 15 वर्षों से इस रेलवे स्टेशन को खुद ही चला रहे हैं। इतना ही नहीं इस रेलवे स्टेशन पर टिकट कलेक्टर भी गाँव का ही एक निवासी है। एक समय में ये रेलवे स्टेशन घाटे में चल रहा था लेकिन अब गाँव वालों ने ही इस रेलवे स्टेशन को कड़ी मेहनत से वापस मुनाफे में ला दिया है।

रेलवे स्टेशन को बंद होने देना नहीं चाहते

दरअसल कई वर्षों पहले भारतीय रेलवे को जोधपुर रेल मण्डल में से एक ऐसे स्टेशन को बंद करना था जिससे आमदनी बहुत ही कम हो रही है। ऐसे में भारतीय रेलवे ने 2005 में जालसू नानक हॉल्ट को बंद करने का फैसला किया था। लेकिन गाँव वाले इस रेलवे स्टेशन को बंद होने देना नहीं चाहते थे। इसलिए गाँव वालों ने रेलवे के इस फैसले के खिलाफ प्रदर्शन करना शुरू कर दिया।

इस फैसले के खिलाफ धरना दिया

गाँव वालों ने करीब 11 दिनों पर इस फैसले के खिलाफ धरना दिया था। ऐसे में रेलवे भी गाँव वालों की बात मानने के लिए तैयार हो गया था लेकिन रेलवे ने भी गाँव वालों के सामने एक शर्त रख दी थी। जिसमें रेलवे ने इस रेलवे स्टेशन की ज़िम्मेदारी लेने से इंकार कर दिया था। रेलवे ने कहा था कि यदि गाँव वाले इस रेलवे स्टेशन को चलाने की ज़िम्मेदारी लेंगे तो इस स्टेशन को बंद नहीं किया जाएगा। वहीं रेलवे ने ये भी शर्त रखी थी कि इस रेलवे स्टेशन से हर दिन 50 और हर महीने 1500 टिकट की बिक्री भी होनी चाहिए।

गाँव वालों ने उठाई रेलवे स्टेशन की ज़िम्मेदारी

ऐसे में गाँव वाले सब कुछ करने को तैयार थे लेकिन वे इस रेलवे स्टेशन को बंद नहीं होने देना चाहते थे। इसलिए गाँव वालों ने मिलकर इस रेलवे स्टेशन की जिम्मेदारी उठाने का फैसला किया। इसके बाद गाँव वालों ने हर घर से चंदा जमा करना शुरू किया। जिससे उनके पास डेढ़ लाख रूपये इकट्ठा हुए। इस पैसों से 1500 टिकट खरीदे गए और वाकई बचे हुए पैसों को ब्याज पर दिया गया।

एक शख्स को टिकट कलेक्टर भी बनाया

वहीं इस गाँव के एक शख्स को टिकट कलेक्टर भी बनाया गया जिसे 5 हज़ार रूपये का वेतन भी मिलता है। हालांकि शुरुआत में गाँव वालों के लिए ये काफी मुश्किल था लेकिन गाँव वालों ने हार नहीं मानी और रेलवे स्टेशन को बखूबी चलाया। आज यही रेलवे स्टेशन हर महीने करीब 30 हज़ार रूपये से ज्यादा कमाई कर रहा है। वहीं आज करीब 10 ट्रेनें भी इस रेलवे स्टेशन पर रुकती हैं।

ये गाँव कहलाता है फौजियों का गाँव

बता दें कि इस गाँव को फ़ौजियों का गाँव भी कहा जाता है। क्यूंकि इस गाँव के हर दूसरे घर में कोई न कोई सेना में अपनी सेवाएँ दे रहा है। आज भी इस गाँव के 200 जवान भारतीय सेना, वायुसेना, CRPF जैसी कई सेना में भर्ती हैं। वहीं यहाँ 250 से ज्यादा रिटायर फौजी भी रहते हैं। 1976 में इस रेलवे स्टेशन को भी फ़ौजियों की सुविधा के लिए ही शुरू किया गया था।

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