Sunday, January 16, 2022

शानदार है पोलियो ग्रस्त इस युवक का हौसला, बन गया मिस्टर व्हीलचेयर इंडिया

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आज भी दिव्यांगों को कई लोग लाचार या मजबूर की नज़रों से ही देखते हैं। आज भी कई लोग दिव्यांगों की मदद सिर्फ लाचार होने के नाते ही करते हैं। कई दिव्यांग भी अपनी जिंदगी को बेकार मानने लगते हैं और दूसरों के ऊपर निर्भर हो जाते हैं वहीं कुछ दिव्यांग लाचार बनने की बजाए अपनी जिंदगी में आगे बढ़ते हैं और अपनी सफलता की कहानी खुद ही लिखते हैं।

ऐसी ही कहानी है गुलफाम अहमद की। गुलफाम आज वाकई हर किसी के लिए प्रेरणा बन चुके हैं। गुलफाम बचपन से ही पोलियो से ग्रसित हैं। लेकिन आज वे खेल और मॉडलिंग के क्षेत्र में अपना खासा नाम बना चुके हैं। हालांकि गुलफाम के लिए ये सफर बिल्कुल भी आसान नहीं था। गुलफाम ने कई मुश्किलों का सामना करने के बाद यहाँ तक का सफर तय किया है। आइए जानते हैं गुलफाम की संघर्ष भरी कहानी।

बचपन से ही पोलियो के शिकार है गुलफाम

जिंदगी में मुश्किलें तो कई होती हैं लेकिन इन मुश्किलों के आगे घुटने टेक देना या फिर मुश्किलों को अवसरों में बदल देना हमारे हाथ में ही होता है। आज हम आपको एक ऐसे ही शख्स के बारे में बताने जा रहे हैं जिन्होंने अपनी मुश्किलों को अवसर में बदला और आज दिव्यांग होने के बावजूद भी अपनी अलग पहचान बना चुके हैं। इस शख्स का नाम गुलफाम अहमद है। गुलफाम फिलहाल दिल्ली में रहते हैं।

हालांकि गुलफाम का जन्म उत्तरप्रदेश में हुआ था। गुलफाम बचपन से ही पोलियो से ग्रसित हैं। गुलफाम के माता पिता ने गुलफाम को कई डॉक्टर के पास दिखाया लेकिन कहीं से भी कोई फायदा नहीं हुआ। गुलफाम अपनी बीमारी के कारण 8 वर्ष तक पढ़ाई भी शुरू नहीं कर पाए थे। उस वक़्त गुलफाम नीचे बैठकर ही चला करते थे। लेकिन बचपन में ही गुलफाम ने कुछ बड़ा और अच्छा करने का सपना देखा था लेकिन इस सपने को पूरा करने के सफर इतना आसान नहीं होने वाला था।

ऐसे मिला स्कूल में दाखिला

गुलफाम 8 वर्ष के हो गए थे लेकिन पोलियो के कारण वे अपनी पढ़ाई भी नहीं शुरू कर पाए थे। उस समय गुलफाम अपना सारा समय खेल कूद में ही बिताया करते थे। गुलफाम के घर के पास 5वीं तक का एको निजी स्कूल भी था जहां लंच टाइम में बच्चे खेला करते थे। गुलफाम भी बच्चों को खेल कूद करते हुए स्कूल के जंगले में से झाँका करते थे। क्यूंकि उनके मन भी स्कूल जाने का सपना था।

Josh Talks में बातचीत के दौरान गुलफाम ने बताया कि इसी बीच स्कूल की प्रिंसिपल ने गुलफाम को ऐसा करते हुए देख लिया जिसके बाद वे गुलफाम को अपने केबिन में ले गईं इस दौरान गुलफाम ने भी प्रिंसिपल को कहा “आंटी जी मुझे भी स्कूल आना है।” बस इसी के बाद गुलफाम का 8 वर्ष की उम्र में दाखिला हुआ लेकिन यहाँ सिर्फ 5वीं तक की ही पढ़ाई होती थी।

एक हादसे ने बदल दी जिंदगी

दरअसल जब 5वीं तक की पढ़ाई पूरी हुई तो गुलफाम को अब आगे की पढ़ाई के लिए सरकारी स्कूल में जाना था जो उनके घर से 1-2 किमी की दूरी पर था। क्यूंकि घर के आर्थिक हालात भी ज्यादा अच्छे नहीं थे इसलिए गुलफाम को सरकारी स्कूल में पढ़ने के लिए भेजा गया। गुलफाम का भाई गुलफाम को रोज स्कूल से लाना ले जाना करता था लेकिन एक दिन उनके भाई को फैक्ट्री से छुट्टी नहीं मिली। तब गुलफाम ने अकेले ही जाने का फैसला किया।

इस दौरान जब गुलफाम नीचे बैठकर स्कूल जा रहे थे तभी उन पर कुत्तो ने हमला कर दिया। इस दौरान उन्हें चोट भी आई थी लेकिन ये बात उन्होंने अपने घर पर नहीं बताई। गुलफाम ने अपनी इस मुसीबत से खुद ही निपटने का फैसला किया। गुलफाम अगले दिन अपने पास एक बिस्कुट का पैकेट रखकर ले गए इसके बाद जैसे ही कुत्ते उनके पास आए तो गुलफाम भागे नहीं बल्कि कुत्तों को बिस्कुट दे दिए जिससे कुछ ही दिन में कुत्ते भी उनके दोस्त बन गए। अब गुलफाम के अंदर भी कुछ करने का आत्मविश्वास बढ़ गया।

खेल के क्षेत्र में बनाई पहचान

दरअसल 8वीं कक्षा में गुलफाम सलमान खान के फैन थे इसलिए गुलफाम ने भी जिम जाना शुरू कर दिया और बॉडी भी बनाना शुरू किया। कुछ ही वर्षो में गुलफाम की अच्छी ख़ासी बॉडी बन चुकी थी। लेकिन उनके पास अपने हुनर को दिखाने का कोई प्लेटफॉर्म नहीं था। तब उनकी मुलाक़ात द्रौणाचार्य अवार्डी और भारत के इंटरनेशनल कोच धवन सर से मुलाक़ात हुई और धवन सर ने ही गुलफाम को पैरालंपिक के बारे में बताया।

11वीं कक्षा में गुलफाम का राष्ट्रीय स्तर के पैरालंपिक में चयन भी हो चुका था लेकिन उनका परिवार इसके खिलाफ था लेकिन गुलफाम छिपते छिपाते नागपुर पहुंचे और खेलों में हिस्सा लिया। यहाँ गुलफाम ने कांस्य पदक हासिल किया। जिसके बाद गुलफाम काफी खुश थे। इसके बाद भी गुलफाम ने राष्ट्रीय स्तर पर कई बार गोल्ड मेडल भी हासिल किया।

45 बार इंटरव्यू देने के बाद भी नहीं मिली नौकरी

इस बीच सब अच्छ चल रहा था लेकिन गुलफाम के पिता की अचानक से आँखें चली गईं जिसके बाद घर की ज़िम्मेदारी गुलफाम के कंधों पर थी। इसके लिए गुलफाम ने अपनी पढ़ाई को भी छोड़ दिया था। अब उन्होंने कई जगह पर इंटरव्यू दिया लेकिन पोलियो के कारण उन्हें कहीं भी नौकरी नहीं दी गई। इस दौरान गुलफाम ने 45 बार इंटरव्यू दिया था। आखिर में उन्हें एक BPO में नौकरी मिली जहां अच्छे प्रदर्शन के कारण वे तीन साल में ही मैनेजर भी बन गए।

इस दौरान गुलफाम के एक दोस्त ने उन्हें बताया कि गुलफाम को सर्जरी करानी चाहिए जिससे वे खड़े होकर चल पाएंगे। गुलफाम को भी ये विचार पसंद आया और उन्होंने डॉक्टर से सलाह ली। डॉक्टर ने उन्हें बताया कि सर्जरी के बाद उन्हें 1 वर्ष तक बेड रेस्ट करना होगा। गुलफाम ने सर्जरी कराई और बिल्कुल भी लापरवाही नहीं बरती। ऐसे में सर्जरी के 90 दिन बाद ही गुलफाम स्वस्थ हो गए। सभी उन्हें देख हैरान भी हो गए थे।

हालांकि अभी भी हीरों बनने का सपना गुलफाम का अधूरा था। इसलिए ने मिस्टर व्हीलचेयर इंडिया में भाग लिया जहां वे विनर बने। इसके बाद गुलफाम का हीरों बनने का भी सपना पूरा हो गया। इसके बाद गुलफाम ने ख्गेल के क्षेत्र को भी नहीं छोड़ा। आज गुलफाम एक मोटिवेशनल स्पीकर, पैरालम्पियन, के तौर पर भी काम कर रहे हैं।

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