Sunday, January 16, 2022

नेता जी सुभाष चंद बोस को बचाने के लिए दांव पर लगाई अपनी जान, ऐसी थी आजादी की मतवाली मित्रा

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नई दिल्ली। भारतीय इतिहास में ऐसी कई महिलाएं हुईं जिन्होंने देश की खातिर अपनी जान को भी खतरे में डाल दिया था। आजड़ी की लड़ाई में अनेकों ऐसी वीरांगनाएँ थी जिनके बलिदान को भारतीयों द्वारा कभी नहीं बुला जा सकता। ऐसी ही एक क्रांतिकारी महिला के बारे में आज हम आपको बताने जा रहे हैं। ये महिला कोई और नहीं बल्कि नेताजी सुभाषचंद्र बोस की भतीजी बेला मित्रा हैं। बेला बहुत कम उम्र में आजादी की लड़ाई का हिस्सा बन चुकी थी। नेताजी के नज़रबंद होने के बाद बेला ने ही वहाँ से भागने में नेताजी की मदद की थी। इतना ही नहीं बेला ने अपनी अंतिम सांस तक निस्वार्थ भाव से जरूरतमंदों की सेवा भी की थी।

आखिर कौन थी बेला मित्रा

बेला मित्रा का जन्म 1920 में कोडालिया में हुआ था। बेला के पिता नेताजी सुभाष चंद्र बोस के बड़े भाई सुरेन्द्र चंद्र बोस की बेटी थी। बेला हमेशा से ही अपने चाचा यानि नेताजी से बेहद प्रभावित थी और यही कारण था कि बेला के मन में बचपन से ही देश के लिए कुछ कर गुजरने की चाह थी। जब 1941 में नेताजी सुभाष चंद्र को नज़रबंद कर लिया गया था तब बेला ने भी नेताजी को भागने में उनकी मदद की। इसी के बाद से बेला भी आजादी की लड़ाई का हिस्सा बन गई थी। 1940 में बेला काँग्रेस विधानसभा छोड़कर अपने चाचा के साथ आजादी के आंदोलन में जुड़ गईं।

 बेच दिए थे शादी के गहने

बेला के पति हरिदास मिश्रा भी एक बड़े क्रांतिकारी थे। भारतीय राष्ट्रीय सेना के गठन के बाद बेला ने झाँसी रानी ब्रिगेड को संभाला। INA ने एक मिशन की शुरुआत की थी जिसके प्रमुख बेला के पति हरिदास मिश्रा थे। लेकिन हरिदास को अंग्रेजों द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया था। तब बेला ने हरिदास की ज़िम्मेदारी को निभाया और मिशन की ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली। इस मिशन से जुड़े क्रांतिकारियों को सही और सुरक्षित जगह पर पहुंचाने के लिए बेला ने अपनी शादी के आभूषणों को भी बेच दिया था। 1944 में गुप्त प्रसारण सेवा शुरू हुई जिसमें रेडियो ऑपरेटर्स और जासूसों का नेतृत्व बेला ने ही किया था। इस काम को बेला कलकत्ता से करती थी और अकेले ही संभालती थी। हालांकि इसमें बेला की जान को भी खतरा था लेकिन बेला ने अपनी जान की परवाह किए बिना देश की रक्षा की।

निभाया था पत्नी होने का फर्ज़

दरअसल द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बेला के पति हरिदास मिश्रा के साथ साथ पबित्रा रॉय, अमर सिंह और ज्योतिष चंद्र बोस को देशद्रोही घोषित कर दिया गया। 1945 में ब्रिटिश सरकार ने उन्हें मौत की सजा सुना दी। लेकिन बेला चुप नहीं बैठने वाली थी। बेला ने पुणे जाकर महात्मा गांधी से मुलाक़ात की और वायसराय लॉर्ड वेवेल को भी सजा कम करने के लिए पत्र लिखा। उनकी मेहनत का नतीजा ये हुआ कि मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया गया। लेकिन 1947 में जब देश आजाद हुआ तो इस सजा को कोई महत्व नहीं था।

 जरूरतमंदों की निस्वार्थ भाव से की सेवा

बेला के पति जहां आजादी के बाद काँग्रेस में शामिल हुए वहीं बेला ने राजनीति को छोड़ने का फैसला किया। वे जरूरतमन्द और विभाजन में हुई हिंसा से पीड़ित लोगों की मदद करना चाहती थी। इसके लिए बेला ने 1947 में झाँसी रानी रिलीफ़ टीम का एक संगठन बनाया जिसमें पीड़ितों के लिए काम किया जाता था। बेला ने कई जगह शरणार्थी शिविर भी लगाए थे। 1952 में बेला ने दुनिया को अलविदा कह दिया लेकिन अपनी आखिरी सांस तक बेला ने लोगों की निस्वार्थ भाव से सेवा की। बेला के महत्वपूर्ण योगदान के लिए पश्चिम बंगाल के हावड़ा के एक रेलवे स्टेशन का नाम “बेला नगर” रखा गया। ऐसा पहली बार था जब किसी महिला को श्रद्धांजली देने के लिए रेलवे स्टेशन का नाम एक महिला के नाम पर रखा गया। ये खास बात ये भी है कि ये वही जगह थी जहां कभी बेला का शरणार्थी शिविर हुआ करता था।

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