Monday, November 29, 2021

धन दौलत छोड़कर शुरू की कुष्ठ रोगियों की सेवा, ऐसे महापुरुष को देश का नमन

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नई दिल्ली : ऐसे बहुत कम लोग होते हैं जो दूसरों के प्रति अपना जीवन समर्पित कर देते हैं। जो दूसरों की निस्वार्थ भाव से सेवा करते हैं। ऐसे ही एक महान व्यक्ति के बारे में आज हम आपको बताने जा रहे हैं जिन्होंने निस्वार्थ भाव से कुष्ठ रोगियों की सेवा की थी। ये महान व्यक्ति कोई और नहीं बल्कि बाबा आमटे हैं।
बाबा आमटे ने कुष्ठ रोगियों की सेवा के लिए अपने धन दौलत को भी छोड़ दिया था। बाबा आमटे के महत्वपूर्ण योगदान को आज भी कोई नहीं भुला पाया है। आज भी उनके वंशज बाबा आमटे की इस सराहनीय प्रथा को आगे बढ़ा रहे हैं। बाबा आमटे जानते हैं बाबा आमटे के जीवन से जुड़ी कुछ खास बातें।

बचपन से ही रखते थे करुणा का भाव

बाबा आमटे को उनके सराहनीय कार्यों के लिए आज भी जाना जाता है। बाबा आमटे का जन्म 26 दिसंबर 1914 को महाराष्ट्र के वर्धा में हुआ था। बाबा आमटे का पूरा नाम डॉ. मुरलीधर देवीदास था। लेकिन बाबा आमटे को उनके परिवार में प्यार से बाबा कहा जाता था इसलिए वे बाबा आमटे के नाम से प्रसिद्ध हुए। बाबा आमटे के पिता भी सरकारी नौकरी करते थे इसलिए बाबा आमटे को कभी किसी चीज़ की कमी नहीं हुई।

प्रेम भाव से भरा है बाबा आमटे का ह्रदय

बचपन से ही बाबा आमटे दूसरों के प्रति प्रेम और करुणा का भाव रखते थे। एक बार बाबा आमटे ने अंधे भिखारी को भीख मांगते हुए देखा उस समय उन्हें इतना दुख हुआ कि महज 9 वर्ष की उम्र में बाबा आमटे ने भिखारी की झोली को रुपयों से भर दिया था। बाबा आमटे ने वकालत की पढ़ाई भी की हुई थी।

एक घटना ने बदल दी बाबा आमटे की ज़िंदगी

बाबा आमटे शहीद राजगुरु के साथी भी थे। साथ ही विनोबा भावे के विचारों ने भी बाबा आमटे को खूब प्रभावित किया था। इसके बाद से ही बाबा आमटे ने दूसरों की सेवा को अपने जीवन का उद्देश्य का बना लिया था। बाबा आमटे ने कई कुष्ठ रोगियों की निस्वार्थ भाव से सेवा की थी।

इस तरह शुरू की कुष्ठ रोगियों की सेवा

एक बार एक कोढ़ी व्यक्ति तेज बारिश में भीग रहा था लेकिन कोई उसकी मदद करने आगे नहीं आया क्यूंकि उस वक़्त कुष्ठ रोग को दैवीय श्राप के तौर पर जाना जाता था और इस रोग से पीड़ित व्यक्ति को समाज से बाहर कर दिया जाता था। लेकिन बाबा आमटे से उस कोढ़ी व्यक्ति का दुख नहीं देखा गया और वे उस व्यक्ति को अपने घर ले आए। इस घटना के बाद से ही बाबा आमटे ने कुष्ठ रोगियों की सेवा करना शुरू किया।

कुष्ठ रोगियों की सेवा के लिए शुरू किया आनंदवन

इस घटना के बाद बाबा आमटे ने कलकत्ता के स्कूल ओग ट्रोपिकल्स मेडिसिन्स में दाखिला ले लिया। इस काम में बाबा आमटे की पत्नी साधना ताई ने भी उनका खूब साथ दिया। कुछ समय बाद बाबा आमटे ने अपनी पत्नी के साथ मिलकर महाराष्ट्र के चंद्रपुर में वरोड़ा के पास आनंदवन की शुरुआत की। इस वक़्त उनके दो बेटे भी उनके साथ थे। यहीं से बाबा आमटे ने महारोगी सेवा समिति को भी शुरू किया था।

जंगल को बना दिया आश्रम

हालांकि जब बाबा आमटे इस जगह पर आए थे तब यहाँ दूर दूर तक सिर्फ पथरीली जमीन और और जंगल थे। लेकिन दोनों ने मिलकर इस जगह का रंग और रूप बदल दिया। बाबा आमटे को जब खुद ये बीमारी हुई तो उन्होंने इसे बढ़ने दिया ताकि दवाइयों का परीक्षण उनके शरीर पर किया जा सके। 1985 में बाबा आमटे ने भारत जोड़ो आंदोलन की भी शुरुआत की थी। इस आंदोलन से बाबा आमटे भारतीय एकता और पर्यावरण की रक्षा का संदेश देना चाहते थे। बाबा आमटे ने नर्मदा बचाओ आंदोलन को भी शुरू किया था

आज बाबा आमटे के वंशज भी कर रहे हैं सराहनीय कार्य

आनंदवन के बाद बाबा आमटे ने नागपुर के पास अशोकवन को भी स्थापित किया था। इसके अलावा सोमनाथ में भी बाबा आमटे ने ऐसे ही एक आश्रम की शुरुआत की थी। बाबा आमटे ने आदिवासियों के कल्याण के लिए भी महाराष्ट्र के गढ़चिरौली के कस्बे में लोक बिरादरी प्रकल्प को शुरू किया था। बाबा आमटे को उनके सराहनीय कार्यों के लिए पद्मश्री, पद्मविभूषण, डेमियन डट्टन पुरस्कार, रेमन मैगसेसे जैसे कई सम्मानित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया था।
हालांकि 2008 में 94 वर्ष की आयु में इस महान व्यक्ति ने दुनिया को अलविदा कह दिया था। लेकिन आज भी बाबा आमटे के वंशज़ उनकी इस सराहनीय प्रथा को आगे बढ़ा रहे हैं। आज आनंदवन में करीब 5 हज़ार लोग एक अच्छा जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

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