Thursday, September 23, 2021

जानिए किस ब्रहमचारी बाबा की बदौलत हरियाणा का रवि दहिया बना इंटरनेशनल पहलवान, दुनिया में रोशन किया नाम

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नई दिल्ली। टोक्यो ओलंपिक में कुश्ती के खिलाडिय़ों ने शानदार प्रदर्शन किया है। इसमे सिल्वर मेडल जीतने वाले रवि दहिया का नाम भी शामिल है। रवि दहिया छह साल की उम्र में ही अखाड़े में जाकर कुश्ती के दांव पेच सीखने लगे थे। उनको कुश्ती के दांव पेच एक ब्रहमचारी बाबा हंसराज ने सिखाए थे। जो अपना घर छोडक़र रवि के गांव के पास आकर बस गए थे।

गुरु हंसराज ने कुश्ती के दांव पेच बताए

दिल्ली के रवि का भव्य स्वागत हुआ था। रवि ने बताया कि वह छह साल की उम्र से ही कुश्ती की ट्रेनिंग लेने लगे थे। उनके गुरु हंसराज ने उनको कुश्ती के दांव पेच बताए। वह कहते है कि बाबाजी के पास परिवार वालों ने केवल इसलिए भेजा था ताकि मैं थोड़ा अनुशासित हो सकूं। लेकिन मुझे भी धीरे धीरे कुश्ती में मजा आने लगा। रवि ने 12 साल की उम्र तक अखाड़े में प्रशिक्षण लिया। इसके बाद आगे के प्रशिक्षण के लिए वह छत्रसाल स्टेडियम चले गए।

बाबा हंसराज बेहद साधारण जीवन जीते है

बाबा हंसराज बेहद की साधारण जीवन जीते है। वह अधिक लाइमलाइट में नहीं रहते है। हंसराज कहते है कि मेरा घर छोडऩे का मकसद केवल ध्यान करना था। लेकिन गांव वाले बार बार बच्चों को कुश्ती सीखाने की जिद करने लगे। पहले तो मैने मना कर दिया, लेकिन जब वह नहीं माने तो मुझे कुश्ती सीखाने के लिए तैयार होना पड़ा। इसके बाद मैंने अपने हाथों से अखाड़ा तैयार किया।हंसराज कहते है कि वह बहुत बड़े पहलवान नहीं थे, लेकिन उनके सपने बड़े थे। किन्हीं कारणों के चलते वह अपने सपनों को पूरा नहीं कर पाए। लेकिन अब उनको खुशी है कि उनके बच्चे सपने को पूरा कर रहे है। वह कहते है कि मैं प्रचार प्रसार से दूर रहता हूं। मेरा ध्यान केवल बच्चों को ट्रेनिंग देने पर है।

बच्चों से किसी तरह की फीस नहीं लेता हूं

हंसराज कहते है कि छह साल की उम्र में उनके पिता रवि दहिया को अखाड़े में छोड़ गए थे। रवि एक प्रतिभावान लडक़ा था। वह हमेशा अपने खेल में लगा रहता था। जब मैने टीवी पर रवि का फोटो देखा तो मैं उसको पहचान पाया। वह कहते है कि 12 साल की उम्र तक मैं खिलाडिय़ों को ट्रेनिंग देता हूं। उसके बाद छत्रसाल स्टेडियम छोड़ देता हूं। वह बताते है कि  बच्चों से किसी तरह की फीस नहीं लेता हूं। जो भी गांव वाले देते है मैं केवल उसी पर निर्भर रहता हूं। हंसराज कहते है कि वह घुटने की चोट के कारण अधिक चल नहीं पाते है। अधिक देर तक बैठ भी नहीं पाते है। वह कहते है कि मैं जो कुछ भी कर रहा हूं। उसमें ही संतुष्ट हूं। मुझे जीवन में अधिक पाने की इच्छा भी नहीं है। वह बताते है कि उनके पास इंटरनेशनल लेवल का प्रशिक्षण देने की कोई सुविधा नहीं है। इसलिए 12 साल के बाद वह बच्चे को छत्रसाल स्टेडियम भेज देते है।

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