Wednesday, September 22, 2021

काट खाने के बाद भी हरियाणा के शेर रवि दहिया ने नहीं मानी हार, जानें कैसे देश के लिए जीती मैडल की लड़ाई

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नई दिल्ली। हरियाणा के इस पहलवान ने अनोखा जोश और असहनीय दर्द सहन कर अपने देश के लिए अनोखी लड़ाई लड़ी और उसमें सफल रहे। यह दास्तान है हरियाणा के रेसलर रवि दहिया की, जिन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना अपने देश के लिए मैडल लाने का जुनून दिखाया। यदि इस दर्द को सहने की बजाए रवि का ध्यान थोड़ा से भी भटका होता तो वह मैडल की लड़ाई में हार जाते। उन्हें खाली हाथ लेकर देश लौटना पड़ता। पंरतु रवि के इस जोश और साहस ने आज उन्हें देश का हीरो बना दिया है।

एक दांव ने बदला पूरा मैच

बता दें कि टोक्यो सेमीफाईनल मैच में रवि दहिया का मुकाबला कजाखिस्तान के पहलवान नूरइस्लाम के साथ था। 57 किलोग्राम के इस मैच में रवि दहिया 2-9 से पीछे चल रहे थे, उनके पास केवल एक ऐसा दांव था, जिसे लड़ाकर वह इस मैच को अपने हक में कर सकते थे। इसी दांव को खेलते हुए ही रवि ने अपने विरोधी पहलवान के दोनों पैरों पर हमला कर दिया और उसे जमीन पर गिराकर अपनी जीत का रास्ता तय कर लिया। लंदन ओलंपिक में पहलवान सुशील कुमार ने भी इस दांव के बल पर 2012 में रजत पदक जीतने का सफर पूरा किया था।

हार सामने देख बौखलाया नूरइस्लाम

शानदार अंक बटोरने के बावजूद अपनी हार को सामने देखकर नूरइस्लाम ने रवि दहिया को बुरी तरह से काट खाया और उसकी बाजू पर अंदर तक दांत गड़ा दिए। यह वाक्या उस समय घटित हुआ, जब रवि ने नूरइस्लाम के कंधे मैट पर टिका दिए। इस दांव से पस्त हुआ नूरइस्लाम अपनी हार को सामने देखकर बुरी तरह से बौखला गया। उसने अपनी हार को जीत में बदलने के लिए रवि की बाजू पर बुरी तरह से काटा। पंरतु रवि के सिर पर तो केवल मैडल लाने का जुनून सवार था। उसकी आंखों के सामने करोड़ों भारतीयों की उम्मीदें थीं। वह मैडल लाने के लिए टोक्यो गया था। फिर वह इस छोटे से दर्द के सामने अपने मैडल को जाता हुआ कैसे देख सकता था। बस रवि ने इस दर्द को आसानी से झेलते हुए अपने विरोधी को धूल चटा दी। इस एक दांव ने रवि दहिया की किस्मत को बदल दिया और आज वह देश का हीरो बनकर सामने आया है।

रवि के पिता की मेहनत रंग लाई

रवि ने अपने साहस, हिम्मत और शौर्य के बल पर इस हारी हुई बाजी को पलट दिया और फाईनल में पहुंचने का अपना रास्ता तय कर लिया। रवि दहिया का परिवार आर्थिक रूप से इतना मजबूत नहीं था, इसके बावजूद उनके पिता ने अपने बेटे के रास्ते में कोई भी रूकावट को बाधा नहीं बनने दिया। 12 साल की उम्र में रवि को छत्रसाल स्टेडिम में सतपाल पहलवान और कोच वीरेंद्र की देखरेख में प्रशिक्षण दिया जाने लगा था। रवि के पिता भी पहलवान थे, मगर परिवार की माली हालत के सामनेे उन्होंने पहलवानी के शौक को खूंटी पर टांग दिया। मगर अपने बेटे को दुनिया का बड़ा पहलवान बनाने के लिए अथक संघर्ष किया। रवि की सफलता में उनके पिता राकेश का बड़ा योगदान है। वह हर रोज सुबह 3 बजे उठकर हरियाणा से 60 किलोमीटर दूर दिल्ली छत्रसाल स्टेडियम तक अपने बेटे को दूध, दही और मक्खन पहुंचाते थे। आज उनकी यह मेहनत रंग ला रही है और उनका बेटा दुनिया भर में अपने परिवार का नाम रोशन कर रहा है।

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