Thursday, September 23, 2021

जानें कैसे एक चपरासी ने खड़ी कर दी थी फैवीकॉल कंपनी, ये है इस शख्स की प्रेरणादायक कहानी

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नई दिल्ली। कहा जाता है कि अगर आपके मन में आगे बढऩे की इच्छा है तो आपको कोई नहीं रोक सकता है। आप अपनी मंजिल को हासिल करके ही दम लेगे। कुछ ऐसा ही फेविकोल के संस्थापक बलवंत पारेख ने किया। वह भारत के बड़े उद्योपतियों में शामिल रहे। उनका फेविकोल ब्रांड अब तक का सबसे मजबूत ब्रांड है। जब भी किसी भी चीज को जोडऩे की बात आती है तो फेविकोल का नाम हमारी जुबान पर सबसे पहले आता है।

मिडिल क्लास फैमली में हुआ था जन्म

बलवंत पारेख का जन्म साल 1925 में गुजरात के एक छोटे से गांव महुआ में मध्यम वर्ग परिवार में हुआ। बचपन से ही बलवंत का सपना था कि वह एक व्यापारी बने। लेकिन परिवार चाहता था कि उनका बेटा वकील बने। वकालत की पढ़ाई के लिए उनको मुंबई जाना पड़ा। वहां जाने के बाद उनका दाखिला एक लॉ कालेज में करा दिया गया।

गांधी के विचारों से प्रभावित होकर बने आंदोलन का हिस्सा

बलवंत व्यापारी बनना चाहते थे। लेकिन परिवार वाले उसके सख्त खिलाफ थे। इसलिए बलवंत अपने विचारों को दबाकर वकालत की पढ़ाई करने लगे। लेकिन उनका पढ़ाई में बिल्कुल भी मन नहीं लग रहा था। जब बलवंत वकालत कर रहे थे तभी उस समय पूरे देश में क्रांति की आग फैली हुई थी। पूरे देश में युवा गांधी के विचारों से प्रभावित थे। गांधी के समर्थन में बाकी युवाओं के साथ बलवंत पारेख भी शामिल थे। वह भी आंदोलन में कूद पड़े।

भारत छोड़ो आंदोलन के चलते छूटी एक साल पढ़ाई

पारेख की भारत छोड़ो आंदोलन के कारण एक साल की पढ़ाई छूूट गई। वह आंदोलन की गतिविधियों में शामिल होने के लिए जगह जगह जाने लगे। बलवंत ने वकालत की डिग्री तो ले ली। लेकिन वह वकालत बिल्कुल नहीं करना चाहते थे। बलवंत बिल्कुल गांधी के विचारों पर चल रहे थे। वह पूरी तरह से सत्यावादी थे।

रोटी के लिए प्रिंटिंग प्रैस में नौकरी

बलवंत ने अपनी रोजी रोटी के लिए प्रिंटिंग प्रैस में नौकरी कर ली। बलवंत हमेशा से व्यवसाय करना चाहते थे। लेकिन परिवार का दवाब होने के कारण उनको नौकरी करनी पड़ी। कुछ समय बाद उन्होंने नौकरी छोड़ दी। फिर वह एक लकड़ी के कारोबारी के यहां चपरासी का काम करने लगे। यहां से उनके जीवन में नया मोड़ आया।

चपरासी की नौकरी करते समय मिला जर्मनी जाने का अवसर

बलवंत को चपरासी की नौकरी करते हुए ही जर्मनी जाने का मौका मिला। यहां पर उन्होंंने कई चीजों को सीखा। वह अपना व्यापार करने के लिए पश्चिम देशों से सामान भी मंगवाने लगे। अब देश आजाद हो चुका था। युवाओं को अपना बिजनेस करने के लिए प्रेरित किया जा रहा था। ऐसे ही युवाओं में बलवंत भी शामिल थे। बलवंत ने साल 1959 पिडिलाइट ब्रांड की स्थापना की।

लकड़ी को चिपकाने के लिए किया जाता था फेविकोल का इस्तेमाल

लकडी की दुकान से ही पारेख को फेविकोल बनाने का आइडिया मिला। वह बताते है कि जब वह मजदूरों को लकड़ी को चिपकाते हुए देखते थे तो बड़ी परेशानी होती थी। वह बताते है कि लकड़ी को चिपकाने के लिए पशुओं की चर्बी का इस्तेमाल किया था। उनको यह देखकर बड़ा कष्ट होता था। उनहोंने सोचा कि ऐसी चीज का अविष्कार किया जाए जिससे कोई भी जोड़ आसानी से चिपक जाए। इसके बाद उन्होंने फेविकोल को बनाया। बलवंत पारेख ने फेविकोल को खोजकर सिर्फ लोगों की परेशानियों को हल किया, बल्कि ये भी दिखा दिया कि दूसरों के रास्ते पर चलकर सफलता हासिल नहीं की जा सकती है। बल्कि अपना रास्ता खुद अलग ही बनाना पड़ता है। तभी सफलता मिलती है।

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