Sunday, October 17, 2021

रहती है करोड़ों की कोठी में, बेचती है सडक़ पर छोले कुल्चे, जानिए इस महिला की प्रेरणादायक कहानी

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गुरूग्राम। यह वक्त और कुदरत ही होती है, जो इंसान को फर्श से अर्श पर और अर्श से फर्श पर पहुंचाने में देर नहीं लगाती। दुनिया में बहुत से ऐसे लोग होते हैं, जोकि रातों रात अमीर बन जाते हैं और ऐसे लोगों की भी इस धरती पर कोई कमी नहीं है, जो धनवान होते हुए गरीब हो जाते हैं। कुदरत इंसान को उसके वक्त के हिसाब से मौका देती है। आज हम आपको ऐसी ही एक महिला से रूबरू करवाने जा रहे हैं, जोकि करोड़ों रुपए की मालिक होने के बावजूद सडक़ों पर छोले कुलचे बेचने के लिए मजबूर हो गई थी।

इस तरह बना लिया खुद को रेस्टोरेंट

इस महिला की कहानी किसी भी तरह से लोगों के लिए प्रेरणा से कम नहीं हैं। हौंसले और जज्बे की धनी इस महिला ने सडक़ पर एक रेहड़ी में छोले कुलचे बेचने का जो सफर शुरू किया था, वह उन्हें एक शानदार रेस्टोरेंट तक ले गया। वास्तव में हरियाणा के गुरूग्राम में रहने वाली महिला उर्वशी यादव की कहानी देश की करोड़ों महिलाओं के लिए प्रेरणा की जीती जागती मिसाल है। इस महिला ने सडक़ पर छोले कुलचे बेचने से लेकर एक शानदार रेस्टोरेंट बना लिया, जोकि वाकई में अपने आप में एक अदभुत कहानी है।

साधन संपन्न परिवार से है उर्वशी

दरअसल बता दें कि उर्वशी का विवाह गुरूग्राम के एक धनाढय़ परिवार में हुआ था। उनके पति एक बड़ी कंस्ट्रक्शन कंपनी में अच्छे पद पर नियुक्त थे। घर में नौकर चाकर तो थे ही, साथ ही सुख समृद्धि और पैसों की भी कोई कमी नहीं थी। वह हरियाणा की हाईटेक सिटी गुरूग्राम में आलीशन घर में अच्छे से जीवन यापन कर रही थीं। पूरा परिवार खुश था और बेहतर तरीके से रह रहा था। पंरतु इस दौरान परिवार के किसी भी सदस्य ने सपने में भी नहीं सोचा था कि कभी उन्हें पाई पाई को भी मोहताज होना पड़ सकता है।

पति के एक्सीडेंट ने बदल दी जिदंगी

मगर साल 2016 और तिथि 31 मई थी, जब उर्वशी के पति अमित का एक खतरनाक एक्सीडेंट हो गया। इस एक्सीडेंट में अमित को काफी चोटें लगी थी, जिसके चलते उनकी कई सर्जरी करवाई गई। चोट अधिक होने की वजह से सर्जरी तो कर दी गई, पंरतु अमित काम करने लायक नहीं रह गए थे। डाक्टरों ने उन्हें बैड रेस्ट की सलाह दी थी। इस सलाह के चलते अमित को मजबूरी में अपनी नौकरी छोडऩी पड़ गई। इसके बाद से परिवार के हालात बदलने शुरू हो गए।

इस तरह से कोठी से सडक़ पर आ गई

परिवार के पास नौकरी के अलावा कमाई का कोई और ऐसा साधन नहीं था, जिससे घर को चलाया जा सके। नौकरी जाते ही बैंक में जमा सेविंगस भी धीरे धीरे खत्म होने लगी। अमित की दवाई, बच्चों की फीस और घर परिवार का खर्च चलाने में सारा पैसा खर्च होने लगा। अचानक से हुई इस आर्थिक बदहाली ने इस परिवार को मुश्किल में डाल दिया। बिना पैसों के एक भी दिन काटना संकट पूर्ण हो गया था। अमित इस हालत में नहीं थे कि वह अपने परिवार को इस चक्रव्यूह से निकाल सकें। वह बेबस थे और तनाव पूर्ण होते इन हालातों को खुली आंखों से देखकर भी कुछ नहीं कर पा रहे थे।

उर्वशी ने ठान लिया था, चक्रव्यूह से निकलना है

ऐसे में उर्वशी ने इस जिम्मेदारी को चुनौती समझते हुए अपने कंधों पर उठाने का निर्णय लिया। उर्वशी ने ठान लिया था कि अपने परिवार को चक्रव्यूह से निकालने के लिए उन्हें ही कोई काम करना होगा। हालांकि उर्वशी को नौकरी करने का भी कोई अनुभव नहीं था, जिसकी वजह से उन्हें आसानी से कोई काम भी नहीं मिलता। हालांकि पढ़ा लिखा होने की वजह से उर्वशी को एक नर्सरी स्कूल में जॉब मिल गई। पंरतु इस जॉब से मिलने वाली रकम इतनी नहीं थी, जिससे वह अपने परिवार को आसानी से चला सकें। इस छोटी सी सैलरी से घर का खर्च चलाना बहुत मुश्किल हो गया था। इस उर्वशी ने कमाई का कोई और जरिया निकालने का सोचा, जिससे अधिक पैसा मिल सके।

छोले कुल्चे बेचने की ठानी

इसके बाद उर्वशी ने अपना खुद का काम खोलने का निर्णय लिया। हालांकि इसके लिए उर्वशी को पैसों की भी जरूरत थी। वह खुद की दुकान खोलना चाहती थी, लेकिन इस काम में पैसा चाहिए था, जोकि उस वक्त उनके पास नहीं था। तब उर्वशी ने एक कठोर फैसला लिया कि दुकान ना सही वह एक ठेला तो लगा ही सकती हैं। यह फैसला परिवार के बहुत से लोगों को रास नहीं आया। मगर उर्वशी ने उस वक्त अपनी जरूरत को देखा और किसी की सलाह को मानें बिना छोले कुलचे का ठेला लगा लिया। उर्वशी के इस फैसले का परिवार ने बहुत विरोध किया और अपनी इज्जत और मान मर्यादा की दुहाई भी दी। पंरतु उर्वशी को पता था कि इस इज्जत और मान मर्यादा से उनके बच्चों को पेट खाली रहेगा। परिवार बदहाली में फंसा रहेगा तथा मदद के लिए कोई भी हाथ आगे नहीं बढ़ाएगा।

उर्वशी ने लगा लिया छोले कुल्चे का ठेला

तब उर्वशी ने गुरूग्राम के सैक्टर -14 में सडक़ किनारे एक ठेला लगाकर छोले कुलचे बेचने शुरू कर दिए। हैरत की बात है कि यह वक्त ही था, जो उर्वशी एसी में रहकर ठाठ बाट की जिंदगी जी रही थी। मंहगे होटल में अपने परिवार के साथ खाना खाने जाया करती थी, उसी उर्वशी को आज सडक़ पर ठेला लगाकर अपने परिवार का पेट पालना पड़ रहा है। यह सोचकर वह ठेला लगाकर छोले कुलचे बेचने लगी। हालांकि यह काम इतना आसान नहीं था, पंरतु धीरे धीरे लोग उनके छोले कुलचे के कायल होने लगे। जो भी उर्वशी के ठेले पर जाता, वह उनके व्यवहार और अंग्रेजी भाषा बोलने से प्रभावित हो जाता। धीरे धीरे उर्वशी का काम चलने लगा और वह हर रोज इतने पैसे कमाने लगी, जिससे घर का खर्च भी निकलने लगा।

इस तरह से हुई पापुलर

यह देखकर परिवार के लोग भी उनकी मदद के लिए सामने आ गए। जो लोग पहले उन्हें ताने मारा करते थे, वह अब उनकी हिम्मत और जज्बे की तारीफ करते नहीं थक रहे थे। यह ठेला अब उर्वशी के लिए सफल बिजनेस का रूप ले चुका था। सोशल मीडिया पर उर्वशी की कहानी जैसे ही वायरल हुई तो गुरूग्राम के कोने कोने से लोग उनके छोले कुलचे खाने पहुंचने लगे। देखते ही देखते उर्वशी का बिजनेस अच्छा खासा चलने लगा तथा परिवार और पति भी संभलने लगे। पति अमित भी ठीक हो गए और वापिस से परिवार पटरी पर आने लगा। इसके बाद उर्वशी ने भी अपने ठेले को रेस्टोरेंट का रूप दे दिया। जहां अब छोले कुलचे ही नहीं, खाने की और भी आईटम बनने लगी हैं। उर्वशी की यह कहानी साबित करती है कि यदि मन में कुछ करने की ठान लो तो फिर कोई भी मंजिल और मुश्किल आपके लिए चुनौती नहीं बन सकती।

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