Thursday, September 23, 2021

पिता ने बस का किराया बचाकर बेटे को बनाया पहलवान, हरियाणा के बजरंग ने दुनिया में बजाया अपने देश का डंका

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झज्जर। कहते हैं कि हार के बाद ही असली जीत होती है। लोग अक्सर हारने के बाद जीत का सपना भूलकर मैदान छोडक़र भाग खड़े होते हैं। बताया जाता है कि देश और दुनिया में हारकर मैदान छोडऩे वालों की संख्या बहुत ज्यादा है, जबकि हारने के बाद लगातार संघर्ष करने वाले ही एक दिन आकाश में चमकते हैं। वह असली योद्धा कहलाते हैं और पूरी दुनिया में अपने देश, प्रदेश व माता पिता का नाम रोशन करते हैं।

ऐसे ही एक योद्धा का नाम है बजरंग पूनिया, जिन्होंने अपनी पहली हार से सबक लेते हुए जमकर मेहनत की। आज परिणाम सभी के सामने हैं। यदि बजरंग अपनी पहली हार से घबराकर मैदान छोड़ जाते तो फिर आज वह इस मुकाम पर खड़े दिखाई नहीं देते। मगर बजरंग ने पूरी ईमानदारी से मेहनत की और निष्ठा और कठोर तपस्या करके आज वह मुकाम हासिल किया, जिसे पाने की हसरत हर कोई रखता है।

हरियाणा के झज्जर जिले के रहने वाले बजरंग पूनिया ने साल 2013 में दिल्ली एशियन गेम्स में पहली बार हार का मुंह देखा था। पंरतु अखाड़े में हारने के बावजूद उन्होंने जिंदगी में हार नहीं मानी। अपनी इस हार को बजरंग ने हथियार बनाया और रात दिन की मेहनत की। इस मेहनत का ह परिणाम यह हुआ कि वह लगातार मैडल जीतने वाली मशीन बन गए। बजरंग ने अपनी अथक मेहनत से वो मंजिल पाई, जिसके बाद उन्होंने ना केवल अपने देश का नाम पूरी दुनिया में चमकाया, बल्कि अपने प्रदेश हरियाणा व अपने परिवार का नाम भी रोशन कर दिया।

बजरंग को पहलवानी विरासत में मिली थी। जिस दिन लोग देश भर में गणतंत्र दिवस समारोह का जश्न मना रहे थे, ठीक उसी तारीख यानि कि 26 जनवरी 1994 को देश के भावी पहलवान बजरंग पूनिया ने अपनी मां की कोख से जन्म लिया। पिता पहलवान थे तो बजरंग ने भी मात्र सात साल की उम्र से ही अखाड़े में दांव पेंच लगाने शुरू कर दिए थे। हालांकि बजरंग के परिवार की आर्थिक हालत अच्छी नहीं थी, इसके बावजूद उनके पिता ने अपने बेटे के लिए बहुत बड़े बड़े सपने देखे थे। इन सपनों को पूरा करने के लिए ही बजरंग के पिता बलवान सिंह ने भी खूब संघर्ष किया। वह अपने बेटे को बड़ा पहलवान बनाना चाहते थे। इसलिए वह बस से जाने की बजाए साईकिल से ही आना जाना करते थे। ताकि बस का किराया बचाकर वह पैसे अपने बेटे की पहलवानी पर खर्च कर सकें।

पिता का सपना भी साकार होने लगा, जब बजरंग ने एशियन गेम्स में अपना पहला गोल्ड मैडल जीता। इस मैच में बजरंग ने अपनी पूरी जान लगा दी और बाजी जीतकर अपने पिता का सपना साकार किया। बजरंग ने अपना पहला गोल्ड मैडल देश के पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी को समर्पित किया। बजरंग केवल पहलवानी में ही अव्वल नहीं थे, बल्कि पढ़ाई में भी वह काफी समय देते थे। उन्होंने ग्रेजुएशन तक की शिक्षा हासिल की और पहलवानी को अपना कैरियर बना लिया।

बजरंग ने हंगरी, स्कॉटलैंड, दक्षिण कोरिया और दिल्ली में आयोजित प्रतियोगिताओं में जमकर मैडल बटोरे हैं। वह अब तक 5 गोल्ड, 3 ब्रोंज, और 4 सिल्वर मैडल जीतकर अपने प्रदेश के साथ साथ अपने माता पिता का नाम भी चमका चुके हैं। दुनिया भर में अपने देश का नाम रोशन कर चुके बजरंग पूनिया को राजीव गांधी खेल रत्न एवं अर्जुन अवार्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है। हरियाणा के हजारों युवा अब बजरंग पूनिया की तरह से ही पहलवान बनना चाहते हैं, ताकि वह भी अपने देश व प्रदेश का नाम रोशन कर सकें।

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