सब्जी व अंडे बेचने वाले इस युवक की ऐसी बदली किस्मत, कड़ी मेहनत से बन गए आईएएस अफसर

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नई दिल्ली। कर हौंसला बुलंद तो कोई मंजिल दूर नहीं, जी-हां यह कहावत उन लोगों पर सटीक बैठती है, जो अपनी मेहनत, हौंसले व कठोर लगन के बल पर बड़ी से बड़ी बाधा को दूर कर अपनी मंजिल हासिल कर लेते हैं। देश में कई युवाओं ने अपनी इसी कोशिश के दम पर ना केवल अपने परिवार बल्कि अपने प्रदेश व देश का नाम भी रोशन किया है। आर्थिक रूप से संपन्न ना होने के बावजूद भी ऐसे युवा उस स्थान को हासिल कर लेते हैं, जिस पर बैठना हर किसी के बूते की बात नहीं होती। आज हम बात करेंगे एक ऐसे युवक की, जिनके पास दो वक्त का खाना जुटाना ही बहुत बड़ी चुनौती थी, इसके बावजूद उन्होंने ना केवल देश की सबसे बड़ी परीक्षा पास की, बल्कि अपने परिवार को आर्थिक बदहाली के दलदल से भी बाहर निकाला।

बेहद ही प्रेरणा दायक है मनोज राय की कहानी-

बिहार के नौजवान मनोज राय ने अपनी अथक मेहनत के दम पर यह सफलता अर्जित की है। इस युवक की कहानी से देश के लाखों लोग प्रेरणा ले सकते हैं। जो लोग यह सोचते हैं कि यदि उनके पास रुपया पैसा होता तो वह बड़ी से बड़ी सफलता हासिल कर सकते हैं, मगर मनोज राय ने उन लोगों की सोच को बदलते हुए यह बता दिया है कि यदि मन में सफलता पाने की ठान लें तो फिर उसे हासिल करने से कोई नहीं रोक सकता। सुपौल बिहार के रहने वाले मनोज राय की किस्मत ने भी उनका पूरा साथ दिया। दरअसल मनोज राय के किस्मत ने ही उन्हें इस परीक्षा तक पहुंचने का रास्ता दिखाया।

12 वीं पास कर नौकरी के लिए आए थे दिल्ली-

सुपौल से 12 वीं की परीक्षा पास करने के बाद मनोज राय अपने परिवार की बदहाल स्थिति को सुधारने के लिए नौकरी करना चाहते थे। इसके लिए वह देश की राजधानी दिल्ली चले आए। यह बात वर्ष 1996 की है, जब मनोज राय दिल्ली आकर कोई भी छोटी मोटी नौकरी करना चाहते थे। मगर तमाम कोशिशों के बावजूद मनोज राय को दिल्ली में कोई नौकरी नहीं मिली। उनका हौंसला जवाब दे चुका था और वह निराशा के गर्त में जाने लगे। तभी उनके मन में ख्याल आया कि क्यों ना कोई अपना ही छोटा सा काम किया जाए। तब मनोज राय ने सब्जी का ठेला लगा लिया, जिस पर सब्जी के साथ साथ वह अंडे भी बेचने लगे। इस काम से वह इतना तो कमाने लगे कि उनका खर्च चल जाए।

मगर नियति को था कुछ और ही मंजूर-

पंरतु नियति को तो कुछ और ही मंजूर था। मनोज राय एक बार दिल्ली की जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में राशन का सामान देने गए थे। उन्हें यह काम मिला था कि वह यूनिवर्सिटी में राशन पहुंचाएं। इस दौरान मनोज राय की वहीं पढऩे वाले एक युवक उदय से मुलाकात हुई। बातों ही बातों में उदय ने उन्हें अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए कहा। मनोज को उदय की यह सलाह बेहद ही पसंद आई। इस तरह से उन्होंने दिन में सब्जी व अंडे बेचने का काम जारी रखा और शाम को अरविंदो कॉलेज में ईवनिंग क्लास ज्वाइंन कर ली। इस तरह से मनोज राय ने वर्ष 2000 में स्नातक की शिक्षा पूरी कर ली। इसी दौरान उदय ने मनोज राय को यूपीएससी की तैयारी भी करने के लिए कहा। इस पर मनोज राय ने दिन रात की कठोर मेहनत के बल पर यूपीएससी की परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी।

प्रोफेसर से दोस्ती हुई तो भूगोल भी पसंद आ गई-

यूपीएससी की तैयारी करते हुए मनोज की मुलाकात अपने एक दोस्त के जरिए पटना विश्वविद्यालय में भूगोल के प्रोफेसर रास बिहारी प्रसाद सिंह के संपर्क में आए। मनोज ने भी प्रोफेसर साहब के साथ रहते हुए भूूगोल की शिक्षा पर ध्यान देना शुरू कर दिया। उन्हें यह विषय इतना पसंद आया कि उन्होंने सिविल सेवा में वैकल्पिक विषय के तौर पर भूगोल का चयन कर लिया। वर्ष 2005 में मनोज ने पहली बार सिविल सेवा की परीक्षा दी, मगर अफसोस यह रहा कि वह इसमें सफल नहीं हो सके। इस बीच उन्होंने अपने खर्च के लिए बच्चों को टयूशन पढ़ाना शुरू कर दिया।

चार बार दी सिविल सेवा की परीक्षा, मगर अफसोस-

मनोज राय ने लगातार चार बार सिविल सेवा की परीक्षा दी, मगर चारों बार वह फेल होते रहे। बावजूद इसके उन्होंने हौंसला नहीं छोड़ा और वह लगातार अपनी तैयारी में जुटे रहे। पांचवी बार फिर से मनोज राय ने सिविल सेवा की तैयारी शुरू की। मनोज राय बताते हैं कि पांचवीं बार उन्होंने अपनी रणनीति में बदलाव किया। अंग्रेजी के लिए उन्होंने हिन्दू अखबार पढऩा शुरू किया। इसका परिणाम यह हुआ कि वर्ष 2010 में वह सिविल सेवा में पास हो गए और एक बड़े अधिकारी बन गए। इसलिए कहते हैं कि बार बार प्रयास करने व सही दिशा में आगे बढऩे पर सफलता जरूर मिलती है। कभी यह जल्दी मिल जाती है तो कभी इसके लिए कठोर परिश्रम और कड़ी मेहनत के बाद लंबा इंतजार भी करना पड़ता है। इसलिए कहते हैं कि मेहनत करने वालों की कभी हार नहीं होती। मनोज राय अपनी उन्नति में अपने दोस्तों को भी पूरा श्रेय देते हैं, जिन्होंने हर कदम पर उनका पूरा साथ दिया।

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