एमडीयू रोहतक को जोर का झटका, इस छात्र को अदालत ने दिया न्याय

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Rohtak News (citymail news) एमडीयू रोहतक में पंचवर्षीय कोर्सों में दाखिलें के लिए आवेदन करने वाले उन छात्रों के लिए राहत की खबर है जिन्होंने समय पर आवेदन फ़ॉर्म भरे थे परंतु यूनिवर्सिटी के अधिकारीयों ने डॉक्युमेंट अपलॉड न होने का कारण देकर उनके फ़ॉर्म रद्द कर दिए थे। रोहतक कोर्ट में सीजेएम आशीष शर्मा ने “अमन भारद्वाज बनाम एमडीयू व अन्य” के केस में आदेश दिया है कि छात्र के आवेदन फ़ॉर्म को स्वीकार कर के ही दाख़िले की मेरिट लिस्ट तैयार की जाए।
छात्र अमन भारद्वाज ने एमडीयू में एलएलबी पंचवर्षीय कोर्स में दाख़िले के लिए आवेदन किया था ओर आवेदन फार्म के लिए सभी आवश्यक कार्यवाही पूरी की थी। परंतु जब एमडीयू ने  21 अगस्त को मेरिट सूची जारी की तो उसमें अमन का फ़ॉर्म रद्द कर दिया गया। छात्र ने इस बारे में एमडीयू में संपर्क किया तो बताया गया की 12वीं कक्षा की डीएमसी अपलोड नही की गई। परंतु छात्र ने फ़ॉर्म में सभी जानकारी अंक सहित फ़ॉर्म में भर रखी थी। छात्र ने इस सम्बंध में एमडीयू को कई मेल भी की व एमडीयू के अधिकारियों से गुहार लगाई की उसके भविष्य को ध्यान में रखते हुए उसके आवेदन को स्वीकार करके उसको मेरिट सूची में शामिल किया जाए । परंतु छात्र की समस्या का कोई समाधान नही किया गया।
जब एमडीयू के अधिकारियों से न्याय नही मिला तो छात्र ने न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया। छात्र की तरफ़ से न्यायालय में अधिवक्ता देवव्रत दलाल, अधिवक्ता अनीश ओहल्याण, अधिवक्ता रजनीश सुन्दरपुर व प्रदीप देशवाल ने पक्ष रखा। एमडीयू की तरफ़ से वरिष्ठ अधिवक्ता वीएस राठी ने पक्ष रखा। दोनो तरफ़ की दलील सुनकर व हर पहलू पर बारीकी से गौर करके सीजेएम आशीष शर्मा की कोर्ट ने छात्र अमन को राहत देते हुए एमडीयू को निर्देश जारी किया की छात्र के फ़ॉर्म को स्वीकार करके उसके अंको के आधार पर उसको मेरिट सूची में शामिल किया जाए।
इनसो प्रदेश अध्यक्ष व अधिवक्ता प्रदीप देशवाल ने बताया कि एमडीयू प्रशासन ने सैकड़ों छात्र छात्राओं के फ़ॉर्म रद्द कर दिए हैं जिससे उनके भविष्य पर तलवार लटक गई है। एमडीयू की ऑनलाइन दाख़िला प्रणाली की त्रुटियों का ख़ामियाज़ा छात्रों को भुगतना पड़ रहा है। एमडीयू कुलपति डॉ राजबीर सिंह छात्रों की समस्या का समाधान करने की बजाए छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ कर रहे हैं। एमडीयू के दाखिलों के लिए जारी किए गए प्रोस्पेक्टस में बिल्कुल साफ़ लिख रखा है की जब तक फ़ॉर्म पूरा नही होगा तब तक फ़ीस का ऑप्सन ही नही आएगा। यदि छात्रों की फ़ीस ली जा चुकी है तो फिर आवेदन फार्म रद्द करने का कोई ओचित्य ही नही बनता।
प्रदीप देशवाल ने बताया की एमडीयू ने छात्रों का पक्ष जानने की बजाय उनको बाहर का रास्ता दिखा दिया।  जब एमडीयू कुलपति से न्याय नही मिला तो छात्रों को न्याय दिलाने के लिए न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया गया। न्यायालय से छात्रों को न्याय मिल रहा है। प्रदीप देशवाल ने बताया की न्यायालय में छात्रों की पैरवी करने के लिए मुफ़्त क़ानूनी सहायता प्रदान की जा रही है व इसके लिए वकीलों की एक पूरी टीम काम कर रही है। किसी भी सूरत में छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ नही होने दिया जाएगा। न्यायालय का यह आदेश एमडीयू के अधिकारियों के लिए एक आइना है। एमडीयू कुलपति को अपनी हठधर्मिता छोड़ कर न्यायालय के आदेशों से सबक़ लेना चाहिए ताकि एमडीयू की गलती का ख़ामियाज़ा छात्रों को न भुगतना पड़े।

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